एक सवेरे जा पहुंचा मै एक बाग़ में..सुहानी फिजा, मदमस्त मौसम था..
राहों में फूलो की सेज थी..
खुशनुमा सा आलम था..
एक गुलाब की कली ने..
मेरे क़दमों का बोसा लिया..
रूहानी हवाओं के थपेड़ो से..
कोयल की कूक से..
फिरदौस का-सा आलम रूबरू हुआ..
मैंने पूछा आस पास की फिजाओं से..
सुहानी चलती उन बयारों से..
कोयल की मीठी कूक से..
तितलियों की रूमानियत से..
मुझ पर क्यों खुदा इतना मेहरबान है..
आज क्यों आला मेरा मुकाम है..
हवाओं ने चलना बन्द किया..
कोयल की कूक थम गयी..
फिजाओं ने मेरी तरफ रुख किया और कहा..
ना खुदा तुझ पर मेहरबान है..
ना अल तेरा मुकाम है..हम तो अपनी मदमस्त चाल चलते जाते है..
खुशियों के गीत सुनाते है..
अपनी सुहानी रंगत से लोगो का दिल बहलाते है..
मेरे कदम वापस जाने लगे..
दिल के कोने से एक आवाज आई..
खुदा ने अपनी इस दुनिया में..
किसी के लिए कोई फर्क ना किया..
फर्क तो हमारे ज़ेहन में है..
वरन ये रूहानी कुदरत सबके लिए ना होती..
फिरदौस का सा आलम यु रूबरू ना होता..!!!!!!